वंश ऋषी एवं गोत्र का महत्व - Importance of Heritage Rishi & Gotra
वर-वधू से उत्पन्न संतान यह, कोईभी शारीरिक व्यंग रहित हो, सुंदर, सबल, बुध्दीमान, एवं शारिरीक - मानसिक और आत्मिक दृष्ट्या सुदृढ एवं प्रज्ञावान हो इसके लिए वर-वधू दोनो के माता - पिता के गोत्र या वंश एक नही होने चाहिए । आधुनिक विज्ञान की खोजों मे भी यह पाया गया है की, वर और वधू यह एक ही गोत्र के होने से, नजदिकी रिश्ते मे होने से और नजदिकी प्रदेश के होने से उनको होनेवाली संतान यह शारीरिक और मानसिक दृष्टी से विकलांग, विकृत एवं कमजोर होने की संभावना बहुत जादा होती है।
आर्य ( सभ्य ) समाज के नियम - Arya Samaj ke Niyam
आधुनिक परिवेश मे लागू करने योग्य आवश्यक सामाजिक नियम - ध्वनी लहरी, विद्युत लहरी और अतिसूक्ष्म प्रकाश लहरीयों द्वारा चले वाले चलदूरध्वनी, दूरदर्शन, एक्स रे, सोनोग्राफी, स्कॅनर्स, जैसे यंत्रो का कम से कम उपयोग करे। बच्चे, युवा पिढी और महिलाओं को सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म के वेद, उपनिषद्, वेदांग, संस्कृत भाषा, योग, राजनीति, न्यायशास्त्र, आयुर्वेद, वास्तु शास्त्र, वैदिक गणित, वैदिक ज्योतिष्य शास्त्र, वैदिक संगीत- नृत्य, प्रसिध्द ऋषी- मुनी इसके बारे मे योग्य गुरू के माध्यम से उचित ज्ञान प्रदान कराए।
Vaidic Sciences Part 8 : Horoscopy - वैदिक ज्योतिष्य विज्ञान
ज्योतिष्य शास्त्र के अनुसार हमारे निकटवर्ती महत्वपूर्ण ग्रह तारों के संबंधी महत्व पूर्ण जानकारीया …… प्रश्न : सत्य सनातन वैदिक ज्योतिष्य शास्त्र के अनुसार पृथ्वी का सूर्य की एक प्रदक्षिणा करने का पथ कितने किलो मिटर का है और उसे पृथ्वी कीस गती से और कितने दिनो मे पूरा करती है ? उत्तर : पृथ्वी का सूर्य को प्रदक्षिणा करने का मार्ग 94.20 कोटी किलो मिटर का है। और उसे पूरा करने के लिए पृथ्वी को 30 किलो मिटर प्रति सेकंद ( 1.07 लाख कि. मी. प्रती तास ) की गती से 365.25 दिन लगते है। इसे ही एक सौर वर्ष कहते है।
हिंदू धर्म प्रश्नोत्तरी - भाग 6 : संस्कारीत पिढी का निर्माण
हिंदू धर्म मे संस्कारीत पिढी की संकल्पना क्या है ? हिंदू धर्म के राष्ट्रगीत मे ही संस्कारीत पिढी की संकल्पना स्पष्ट की गई है, वह निम्नानुसार है …. आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् । आ राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्योऽव्याधी महारथो जायताम् । दोग्ध्री धेनुर् वोढानड् वानाशु:, सप्ति: पुरन्धिर् योषा जिष्णू रथेष्ठा:, सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्। निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ऽ ओषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम् ।। —- यजुर्वेद २२.२२
Vaidic Pleasure Philosophy - वैदिक आनंद तत्वज्ञान
गुरूकुल मे गुरू शिष्यों को सबसे पहले परिश्रम करना और दैनिक संध्या, यज्ञ, अष्टांग योग, इत्यादी साधना सिखाते थे। उसके पश्चात बालक के परिवार से संबंधीत विद्या और सर्वसाधारण व्यहारीक विद्याए सिखाते थे। इसके बाद शिष्य को उसकी अभिरूची और क्षमता के अनुसार विशेष विद्याए सिखाते थे। इस तरह सत्य सनातन धर्म मे प्रत्येक बालक को वैदिक शिक्षा द्वारा एक उत्तम मनुष्य बनाकर एवं एक उत्तम नागरीक बनाकर संपूर्ण आनंददायी और सुरक्षित समाज और राष्ट्र का निर्माण करने का प्रयास किया जाता है। सत्य सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य जीवन का उद्देश सात्विक आनंद को प्राप्त करना यह है। और मनुष्य को सात्विक आनंद यह प्रकृती पूरक, राष्ट्र पूरक और समाज पूरक कार्य करने से ही प्राप्त होता है एैसा सभी वैदिक साहित्यों मे बताया गया है।
Ayurvedic Intake System - आयुर्वेदिक आहार तंत्र
आयुर्वेद के अनुसार आरोग्य के लक्षण - सम दोष: समाग्निश्च सम धातु मल क्रिया: । प्रसन्नात्मेंद्रियमन: स्वस्थैत्यभियते ।। ।।शुश्रुत ।।
वैदिक धर्म परिचय प्रश्नोत्तरी - भाग 5 : संस्कृत भाषा
संस्कृत यह एक संपूर्णत: शास्त्रोक्त भाषा है। संस्कृत यह ब्रह्मांड की भाषा है । संस्कृत यह एक नैसर्गिक भाषा है। संस्कृत एक सनातन एवं पूरातन भाषा है । संस्कृत यह स्वरमय एवं संगीतमय भाषा है। संस्कृत भाषा मे भाव, उच्चारण एवं भौतिक प्रकटीकरण एकजैसा एवं संपूर्ण होता है। संस्कृत भाषा को सही उच्चारण के साथ बोलने के लिए आपके सातो चक्रों का उपयोग होता है, इसलिए आपके सातों ऊर्जा चक्र जागृत होने मे और संतुलित होने में मदत मिलती है और चैतन्य ऊर्जा का प्रवाह आपके सहस्त्रार चक्र की ओर अग्रेसर होने में मदत मिलती है, इस कारण आपको परम् आनंद की अनुभूति होती है। संस्कृत यह इंडो- युरोपीयन प्रकार मे आने वाली भाषा है। युरोपीयन देश - जर्मनी, फ्रांस, स्पेन, पोर्तुगाल, इटली, ईत्यादी ५६ देशों के भाषा का मूल आधार संस्कृत है।
वैदिक धर्म परिचय : भाग 4 - वैदिक धर्म की आरोग्य संबंधी मान्यताए
वैदिक आरोग्य संकल्पना हिंदू धर्म की संपूर्ण अवधारणा किस उद्देश्य से की गई है ? हिंदू धर्म की संपूर्ण अवधारणा यह मनुष्य के आरोग्यदायी और आनंददायी जीवन के उद्देश्य से की गई है । इस कारण हिंदू धर्म के सभी तत्व एवं नियम यह हमारे चिरंतर आरोग्यदायी और आनंददायी जीवन के मूलतत्त्व है। इसिलिए हमे जीवन मे हिंदू धर्म के तत्वों को समझ लेना चाहिए और उनका यथायोग्य पालन करना चाहिए।
वैदिक धर्मग्रंथों की वैज्ञानिकता, नैसर्गिकता और नश्वरता
वैदिक धर्मग्रंथो की वैज्ञानिकता, नैसर्गिकता और नश्वरता हमे हिंदू धर्म के वैदिक धर्मग्रंथो को वैज्ञानिक आधार पर सिखना बहुत जरूरी है, क्योकी, हिंदू धर्म के वैदिक धर्मग्रंथो मे बताए गए सिध्दांत और तत्वज्ञान यह हमारे युवा पिढी को शारिरीक, मानसिक, बौध्दीक, और आत्मिक स्तर पर शक्तीशाली बनाते है। यह ज्ञान युवकों की गुण ग्रहण करने की क्षमता, नये विषयों का विश्लेषण करने की क्षमता, सत्य को समझने की क्षमता, यादास्त क्षमता, विषयों को प्रस्तुत करने की क्षमता, विचारों की स्पष्टता, मुखमंडल का तेज और आत्मविश्वास इन सब को असाधारण रूप से बढता है।
वैदिक हिंदू धर्म परिचय प्रश्नोत्तरी
वैदिक हिंदू धर्म परिचय प्रश्नोत्तरी प्रस्तावना हमे हिंदू धर्म के वैदिक धर्मग्रंथो को वैज्ञानिक आधार पर समझकर सिखना बहुत जरूरी है। क्योकी, हिंदू धर्म के वैदिक धर्मग्रंथो मे बताए गए सिध्दांत और तत्वज्ञान यह हमारे युवा पिढी को शारिरीक, मानसिक, बौध्दीक, और आत्मिक स्तर पर शक्तीशाली बनाते है। यह ज्ञान युवकों की गुण ग्रहण करने की क्षमता, नये विषयों को सिखने की क्षमता, नये विषयों का विश्लेषण करने की क्षमता, सत्य को समझने की क्षमता, यादास्त क्षमता, विषयों को प्रस्तुत करने की क्षमता, विचारों की स्पष्टता, मुखमंडल का तेज और आत्मविश्वास इत्यादी को असाधारण रूप से बढता है।
हिंदू धर्म विज्ञान प्रश्नोत्तरी - भाग 1 : धर्मग्रंथ वेद
हिंदू धर्म विज्ञान प्रश्नोत्तरी - भाग 1 : धर्मग्रंथ वेद प्रश्न : हिंदू धर्म का पूरा नाम क्या है ? उत्तर : हिंदू धर्म का पूरा नाम “ सत्य सनातन वैदिक धर्म ” है। यह धर्म सर्व प्रथम हिमायल की वादियों मे और सिंधू नदी की घाटी मे विकसित हुवा था। परंतु सिंधू शब्द के अस्पष्ट उच्चारण के कारण पाश्चिमात्य मध्य एशियाई देशो मे इस धर्म का नाम हिंदू धर्म कहलाया गया । प्रश्न : हिंदू धर्म का मुख्य एवं मूलभूत धर्मग्रंथ कौनसा है ? उत्तर : वेद यह हिंदू धर्म का मुख्य एवं मूलभूत धर्मग्रंथ है।
हिंदू धर्म विज्ञान प्रश्नोत्तरी - भाग 2 : वैदिक काल गणना
हिंदू धर्म के अनुसार काल गणना - हिंदू धर्म के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ती कब हुई है ? हिंदू धर्म के अनुसार पृथ्वी 196 करोड वर्ष पहले अस्तित्व मे आई है।
वैदिक धर्म प्रश्नोत्तरी : भाग 3 - वैदिक धार्मिक मान्यताए
वैदिक हिंदू धर्म मे ईश्वर संबंधी मान्यताए - प्रश्न : सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म मे ईश्वर की संकल्पना क्या है ? उत्तर : सत्य सनातन वैदिक धर्म में ईश्वर यह एक सच्चिदानंद स्वरूप वैश्विक उर्जा होने की बात कही गई है और ईश्वर का मूल नाम ॐ / ओं / ओ३म् बताया गया है और इसी को विश्व की आदिशक्ती कहा गया है।
भारतीय काल गणना
हिन्दू धर्म में समय की बहुत ही व्यापक धारणा है। क्षण के हजारवें हिस्से से भी कम से शुरू होने वाली काल गणना ब्रह्मा के 100 वर्ष पर भी समाप्त नहीं होती। हिन्दू मानते हैं कि समय सीधा ही चलता है। सीधे चलने वाले समय में जीवन और घटनाओं का चक्र चलता रहता है। समय के साथ घटनाओं में दोहराव होता है फिर भी घटनाएं नई होती हैं।