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हिंदू धर्म प्रश्नोत्तरी - भाग 6 : संस्कारीत पिढी का निर्माण

हिंदू धर्म प्रश्नोत्तरी - भाग 6 : संस्कारीत पिढी का निर्माण


हिंदू धर्म मे संस्कारीत पिढी की संकल्पना क्या है ? 


हिंदू धर्म के राष्ट्रगीत मे ही संस्कारीत पिढी की संकल्पना स्पष्ट की गई है, वह निम्नानुसार है ….


आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् । 

आ राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्योऽव्याधी महारथो जायताम् ।

दोग्ध्री धेनुर् वोढानड् वानाशु:, सप्ति: पुरन्धिर् योषा जिष्णू रथेष्ठा:,

सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्।

निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ऽ ओषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम् ।।

                            

         —- यजुर्वेद २२.२२


हे भगवान इस राष्ट्र मे रहनेवाले ब्राह्मण लोग ( विद्या अध्ययन अध्यापन करनेवाले और संशोधन कार्य करनेवाले लोग ) विद्या और संशोधन कार्य को बढावा देनेवाले होवे ।

इस राष्ट्र के राजा, क्षत्रिय ( राष्ट्र का रक्षण करनेवाले लोग ) और अन्य प्रजाजन शूरवीर, व्याधिरहीत और रथ आदी आधुनिक यंत्रों से सज्य होवे । 

राष्ट्र मे भरपूर दूध देनेवाली गाये हो, जो सभी प्रकार की दरीद्रता और व्याधीयों को नष्ट करे, प्रजा सात प्रकार के रक्षा प्रणाली से संरक्षित हो और व्यापारी रथ आदी आधुनिक यंत्रों की मदत से सुदूर प्रदेशों से व्यापार करने मे सक्षम होवे ।

राष्ट्र की पंचायत सभाओं मे युवा वर्ग और अनुभवी वयोवृध्द प्रजाजन हो और वह सभी वीर पुरूष हो ।

समय - समय पर वर्षा हो, जिससे भरपूर फसल हो और औषधी वनस्पत्ती हो जिससे सभी प्रजाजनों के कष्टों को कई युगों तक नष्ट कीया जा सके। 


        उपरोक्त यजुर्वेद के मंत्र मे एक शक्तीशाली राष्ट्र के लिए किस प्रकार के प्रजाजन का होना आवश्यक है इसके बारे मे अपेक्षाए की गई है और मार्गदर्शन किया गया है। उपरोक्त  उद्देशों को सामने रखकर ही आदर्श और संस्कारीत पिढी का निर्माण करने का मार्गदर्शन इस वेद मंत्र मे कीया गया है और इस उद्देश्य को प्रजाजन कभी न भूले इस कारण इस वेद मंत्र को वैदिक राष्ट्रगीत के रूप मे अपनाया गया है। 


हिंदू धर्म मे संस्कारीत पिढी के निर्माण के लिए और क्या नियोजन किया गया है ? 


हिंदू धर्म मे संस्कारीत पिढी के निर्माण के लिए निम्नानुसार 16 संस्कारों का प्रवधान किया गया है….

  1. गर्भाधान संस्कार 

  2. पुसंवन संस्कार 

  3. सिमंन्तोन्नयन संस्कार 

  4. जातकर्म संस्कार 

  5. नामकरण संस्कार 

  6. निष्क्रमण संस्कार 

  7. अन्नप्राशन संस्कार 

  8. चुडाकर्म एवं मुंडन संस्कार 

  9. विद्यारंभ संस्कार 

  10. कर्णवेध संस्कार 

  11. यज्ञोपवित संस्कार 

  12. वेदारंभ संस्कार 

  13. केशांत संस्कार 

  14. समावर्तन संस्कार 

  15. विवाह संस्कार 

  16. अंतेष्टी / दाह संस्कार 



संस्कारीत पिढी निर्मिती के संदर्भ मे हमारी मुख्य समस्याक्या है


संस्कारीत पिढी निर्मिती के संदर्भ मे हमारी मुख्य समस्या यह है की संस्कारीत पिढी के संदर्भ मे हमारी संकल्पनाए और मान्यताए स्पष्ट नही है


आदर्श व संस्कारीत पिढी हम किसे कहेंगे …… 


  1. शारिरीक, मानसिक, बौध्दीक आणि आत्मिक  दृष्ट्या बलवान व सुद्रुढ पिढी

  2. दिखने को सुंदर व सुद्रुढ पिढी

  3. माता-पिता और बडों के योग्य आदेशों का पालन करने वाली पिढी 

  4. माता-पिता और बडों के योग्य सन्मान करनेवाली पिढी

  5. राष्ट्र व समाज के प्रती समर्पित रहकर भरपूर संम्पत्ती कमानेवाली पिढी

  6. खूप धौर्यावान, हिम्मतवान आणि सत्तावान पिढी

  7. चौसष्ठ कलाओं मे तरबेज पिढी

  8. आधूनिक तंत्रज्ञानात तरबेज पिढी



संस्कारीत पिढी संबंधी युवकों की समस्याए ……  


  1. माता-पिता की ओर से उनकी अतृप्त इच्छाए पूर्ण करने की युवाओं से अवाजवी अपेक्षाए रखना, जिन्हे पूरा करने की क्षमता उनके पाल्य है या नही यह देखे बिना इच्छाओं की पूर्ती के लिए गैरवाजबी दबाव बनाए रखना।

  2. माता-पिता केवल किताबी पढाई मे अव्वल आने को जरूरत से जादा महत्व देते है।

  3. युवाओं के सामने जीवन निर्वाह का मार्ग चुनने का सबसे बडा प्रश्न होता है, जिसके लिए बहुतांश माता-पिता उचित मार्गदर्शन एवं सहकार्य नही कर पाते । सामाजिक अपेक्षां केवळ भौतिक स्वरूपाच्या आहेत, त्यावर खरे उतरणे खूप कठीण जाते.

  4. युवाओं की उम्र के अनुसार उनकी भावनाओं का सम्मान नही किया जाता, जैसे की, बच्चों की मैदान मे खेलने की इच्छा का विरोध करना, इत्यादी 

  5. कई बार बच्चों की उम्र और अभिरूची का ध्यान न रखते हुए उनके सामने महाभयंकर आर्थिक, सामाजिक व जागतिक प्रश्न रखे जाते है, और उनसे उवको छुडाने की अपेक्षा रखी जाती है, लेकिन एैसी सदस्यों के बारे मे उनकी उचित पूर्व तयारी नही कराई जाती । 



युवाओं के बारे मे माता-पिता की गलत सोच ……..


  1. हमारे बच्चे हमारी वैयक्तिक संम्पती है। 

  2. हमारे बच्चे हमारी हमारी अतृप्त ईच्छा पूर्ण करे।

  3. बच्चों को हमसे जादा नही समझता । 

  4. हमारे जीवन मे हमे जो सुख- सुविधाए और प्यार नही मिली वह सब भरपूर मात्रा मे हम हमारे बच्चो को देंगे । लेकिन यह सुविधाए और प्यार अती मात्रा मे बच्चों को देने के दूरगामी विपरित परिणामों पर विचार नही किया जाता। 

  5. हम बच्चों का अच्छा पालन पोषण करके उन पर ऊपकार कर रहे है, जिसकी वापसी उन्होने हमारी अतृप्त ईच्छांए पूरी करके करनी चाहिए।  

  6. बुढापे मे बच्चे हमारे ही पास रहे इस उद्देश को सामने रखते हुए बच्चों को अनेक अच्छे विकास के मैकों से दूर रखना।