हिंदू धर्म विज्ञान प्रश्नोत्तरी - भाग 1 : धर्मग्रंथ वेद
प्रश्न : हिंदू धर्म का पूरा नाम क्या है ?
उत्तर : हिंदू धर्म का पूरा नाम “ सत्य सनातन वैदिक धर्म ” है। यह धर्म सर्व प्रथम हिमायल की वादियों मे और सिंधू नदी की घाटी मे विकसित हुवा था। परंतु सिंधू शब्द के अस्पष्ट उच्चारण के कारण पाश्चिमात्य मध्य एशियाई देशो मे इस धर्म का नाम हिंदू धर्म कहलाया गया ।
प्रश्न : हिंदू धर्म का मुख्य एवं मूलभूत धर्मग्रंथ कौनसा है ?
उत्तर : वेद यह हिंदू धर्म का मुख्य एवं मूलभूत धर्मग्रंथ है।
प्रश्न : वेद यह एक है या अनेक है ?
उत्तर : वस्तुत: वेद एक ही ग्रंथ है। परंतु ग्रंथ के बहुत विस्तार के कारण, वेद को चार भागो मे विभागा गया है। यह चार भाग निम्नानुसार है ….
ऋग्वेद
सामवेद
यजुर्वेद
अथर्ववेद
प्रश्न : हिंदू धर्म के अनुसार वैदिक ज्ञान कैसे प्राप्त हुवा और उसमे किस संबंध मे जानकारी दि गई है ?
उत्तर : हिंदू धर्म के अनुसार इस पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही मनुष्य की सभी जरूरतों के संदर्भ में ईश्वरीय वैश्विक शक्ती द्वारा ऋषियों को ज्ञान दिया गया था, जो वेद, वेदांग एवं उपनिषदों के रूप में लिखा गया। इसे ही वैदिक ज्ञान कहते है।
इस वैदिक ज्ञान के आधार पर पृथ्वी पर मानव समाज का दैनंदिन जीवन क्रम प्रारंभ हुवा। इस मानव समाज के न्यायपूर्ण संचालन एवं संरक्षण के लिए राज सत्ताओं का निर्माण हुवा। यह समाज एवं राज सत्ताओं का संचलन वेदों में बताए गए नीति नियमों के अनुसार किए जाने लगा।
वेदों के अनुसार ब्रह्मांड के उत्पत्ती और संचालन करने वाली शक्ति यह वैश्विक सचिदानंद स्वरूप शक्ति है।
वेदों में मनुष्य ने नैसर्गिक संसाधनों का मर्यादित उपभोग करते हुए भौतिक ( लौकिक ) और पारलौकिक आनंद को प्राप्त करने पर बल दिया गया है।
वेदों में मनुष्य के कर्म के अनुसार सुख और दुःख ( पाप और पुण्य रूपी फल ) की बात मान्य की गई है ।
वेदों में पुनर्जन्म की बात मान्य की गयी है।
उपरोक्त प्रमुख वैदिक मान्यताओं पर आधारीत समाज और राज सत्ताओं का सर्व प्रथम निर्माण कीया गया था।
प्रश्न : हिंदू धर्म के अनुसार ईश्वर द्वारा प्रस्थापित वैदिक समाज व्यवस्था और राज व्यवस्था के बावजूद समाज मे सदा ही असंतोष और विद्रोह क्यो होते रहे है ?
उत्तर : मनुष्य के मन मे उपस्थित अधिक सुख, संम्पत्ती और सम्मान पाने की चाहत और मनुष्य के मन मे उपस्थित राग, द्वेश, लोभ, मोह, मद और क्रोध और प्रस्थापित लोगों द्वारा और सत्ताओं द्वारा किए जाने वाले अन्याय के कारण समाज मे सदा ही असंतोष और विद्रोह होते आ रहे है।
प्रश्न : हिंदू धर्म के अनुसार असुर, राक्षस, म्लेच्छ, अधर्मी लोग कौन है ?
उत्तर : हिंदू धर्म के अनुसार, समाज में जो नैसर्गिक संसाधनों का अति उपभोग करने की मानसिकता रखनेवाले लोग होते है और जो वैदिक मान्यताओं के विरूध्द विचारधारा रखनेवाले लोग होते है, उनको असुर, राक्षस, म्लेच्छ, अधर्मी, इत्यादि नामों से जाना गया है।
प्रश्न : हिंदू धर्म के वेद, उपवेद, उपनिषद और वेदांग यानी ब्राह्मण ग्रंथ और आरण्यक ग्रंथ मे किन बातों का ज्ञान दिया गया है ?
उत्तर : हिंदू धर्म के वेद, उपवेद, उपनिषद और वेदांग यानी ब्राह्मण ग्रंथ और आरण्यक ग्रंथ मे सृष्टी की निर्मिती से लेकर मनुष्य की निर्मिती तक का और मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत के वैयक्तिक, सामाजिक और आदि दैविक कर्तव्यों का ज्ञान दिया गया है। वेद मे सृष्टी का सूक्ष निरिक्षण करने पर और सतत चिकित्सक वृती से संशोधन करने पर बहुत अधिक जोर दिया गया है ।
प्रश्न : वेद मंत्र यह कौनसी भाषा मे लिखे गए है ?
उत्तर : वेद मंत्र यह संस्कृत भाषा मे लिखे गए है।
प्रश्न : वेद मंत्रो के सही उच्चारण को बहुत अधिक महत्व क्यो दिया गया है ?
उत्तर : वेद मंत्रो के प्रत्येक अक्षर, शब्द और मंत्रों के सस्वर सही उच्चारण का बहुत महत्व है, क्योकी, वैदिक संस्कृत मे प्रत्येक अक्षर और शब्द के सही उच्चारण के द्वारा उत्पन्न ध्वनी लहरी के आधार पर ही शब्दों का सही अर्थ, उनका संबंध और परिणाम जुडा हुवा होता है।
वेद मंत्रों के सस्वर सही उच्चारण का बहुत अच्छा लाभ सकारात्मक उर्जा निर्मिती के स्वरूप मे, हमारे आरोग्य, निसर्ग, पेड-पैधे और पशु- पक्षीयों पर होता है ।
प्रश्न : वेदो मे हमे अभी दिखाई देनेवाले अती सूक्ष्म यंत्रो का और अवकाश गमन जैसे महा भयंकर यंत्रों का ज्ञान दिया गया है क्या ?
उत्तर : नही, वेद मे हमे अभी दिखाई देनेवाले अती सूक्ष्म यंत्रो का और अवकाश गमन जैसे महा भयंकर यंत्रों का ज्ञान नही दिया गया है । क्योंकी यह ज्ञान मनुष्य के नैसर्गिक और नितांत आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए आवश्यक नही है। मनुष्य आधूनिक ज्ञान द्वारा ईश्वर के कार्य अपने हात मे लेना चाहता है, जोकी, पूर्णत: अनैसर्गिक बात है। यही कारण है की मनुष्य इतना भौतिक विकास करने के बावजुद चिरंतर आनंद को नही प्राप्त कर पाया है।
प्रश्न : वेद भौतिक विकास का विरोध करता है क्या ?
उत्तर : नही, वेद भौतिक विकास का विरोध नही करता। बल्की वेद तो मनुष्य को निसर्ग का निरिक्षण करके और संशोधन करके भौतिक विकास करके धन-धान्य, रत्न, रथ, भवन, और राज्य आदी पाकर अपनी किमान आवश्यकताओं को अच्छे से पूर्ण करने का उपदेश देता है। लेकिन वेद अती भौतिक विकास का समर्थन नही करता। वेद मनुष्य को उसकी किमान आवश्यकताओं को पूरा करने की हद तक ही भौतिक विकास का समर्थन करता है। वेद निसर्ग के संसाधनों का मर्यादित उपभोग लेने का ही मनुष्य को उपदेश करता है। वेद कहता है की केवल भौतिक सुखों का अमर्याद उपभोग करना ही मनुष्य के जीवन का अंतीम उद्देश नही है। बल्की सृष्टी और मनुष्य के निर्मिती का उद्देश यह भौतिक जगत के पिछे कार्य कर रहे अभौतिक उर्जा जगत को अधिक से अधिक समझ कर उसका आनंद प्राप्त करना है यह बार- बार बताया गया है। जैसे की, १. तमसो मा ज्योतिर्गमयं, २. सूर्यो ज्योति: ज्योतिर्वच: स्वाहा, ईत्यादी ।
प्रश्न : वेद मंत्रो का स्वरूप यह ईश्वर द्वारा आज्ञा दिए जाने का है ? या मनुष्य द्वारा ईश्वर को प्रार्थना करने का है ?
उत्तर : वेद मंत्रो का स्वरूप यह न तो ईश्वर द्वारा आज्ञा दिए जाने का है और न ही मनुष्य द्वारा ईश्वर से केवल प्रार्थना करने का ही है।
वेद मंत्रों मे दिया गया ज्ञान यह मनुष्य को अपने मन और बुध्दी को सृष्टी का रहस्य समझा कर आनंदमय तरीके से जीवन जिने का मार्ग दिखलाया गया है। इस ज्ञान के राह पर मनुष्य को प्रत्यक्ष चलना है, तब ही वह प्रत्यक्ष सुख और आनंद को प्राप्त कर सकता है। इस ज्ञान की राह पर चलने का संकल्प दृढ करने के लिए और सफलता पाने के लिए परब्रह्म की शक्तीयों का आवाहन वेद मंत्रों के सस्वर उच्चारण द्वारा बार-बार करते रहना आवश्यक है। एैसे सविचार आवाहन के द्वारा हमारे शरीर के अंदर के वैश्विक शक्ती की संग्राहक कोषिकाए जागृत होकर वैश्विक शक्ती से जुड कर वैश्विक शक्ती को प्राप्त करके हमारे शरीर मे असाधारण उर्जा को संग्रहीत कर सकती है। जिसके कारण हमे कई सिध्दीया मिलती है और हमारे सौंदर्य तथा प्रभा मंडल मे असाधारण वृध्दी होकर चुंबकिय आकर्षण शक्ती उत्पन्न होती है। परब्रह्म के इन शक्तियों के इस आवाहन को हम प्रार्थना कह सकते है।
प्रश्न : वेद का पहला मंत्र कौनसा है और उसका अर्थ क्या है ?
उत्तर :
ओ३म् अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् ।
होतारं रत्नधातमम् ।।१।।
ऋग्वेद १.१.१
यह ऋग्वेद का पहला मंत्र है। इसका अर्थ निम्नानुसार है।
ओ३म् अग्नि हमे मिले, जिससे हमारा पहले हित हो, इस अग्नि से हम यज्ञ करके प्रत्येक ऋतु मे होनेवाली व्याधिओंपर विजय प्राप्त कर, रत्न और धातुओं के समान दैदिप्यमान होवे।
उपरोक्त मंत्र मे विश्व संचालक ओ३म् अग्नि, जो हमारे शरीर मे चैतन्य उर्जा के रूप मे प्रवाहित है, उसके बारे मे कहा गया है । यह ओ३म् रूपी चैतन्य उर्जा को हम अधिक से अधिक प्राप्त करे, जिससे हमारा शरीर स्वस्थ रहने का हमे सर्व प्रथम लाभ होगा और इसी बढे हुए चैतन्य उर्जा के माध्यम से सृष्टी के प्रत्येक ऋतु मे होनेवाले विभिन्न रोगोंपर विजय प्राप्त करना मुमकिन होगा और इस बढे हुए उर्जा के कारण हमारा शरीर विभिन्न रत्न और धातुओं के समान कांतीवान और दैदिप्यवान बनेगा।
( विभिन्न प्रकार के अग्नि के संबंध मे भाग क्र. 9 मे अधिक जानकारी दि गई है )
प्रश्न : वेद मे समाज की अवधारणा किस स्वरूप मे की गयी है ?
उत्तर : वेद मे समाज की अवधारणा मनुष्य शरीर के चार प्रमुख कार्यो के रूप मे की है ।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत: ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्य: पद् भ्या गं शूद्रो अजायत ।।
शरीर मे मुख के समान ब्राह्मण का कार्य होता है, क्षत्रिय का कार्य शरीर के हातो की तरह होता है, शरीर मे पेट का कार्य समाज मे वैश्य के समान होता है, पैरो का कार्य समाज मे शुद्र के समान होता है।
प्रश्न : वेद मे संघटन संबंधी क्या मार्गदर्शन किया गया है ?
उत्तर : वेद मे मनुष्यने संघटित होकर सभी सामाजिक कार्य करने का विस्तृत मार्ग दर्शन किया गया है। इस के लिए पूरा एक अलग भाग “ संघटन सूक्त नाम ” से दिया गया है।
प्रश्न : वेद मे मनुष्य के सौ वर्ष आरोग्यदायी जीवन जीने के संबंध मे कौनसा मंत्र दिया गया है ?
उत्तर :
ओ३म्, तच्चक्षुर् देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्।
पश्चेम शरद: शतं जीवेम शरद: शतं शृणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात् ।। यजु.
प्रश्न : वेद मे विश्वशांति के संदर्भ मे कौनसा मंत्र दिया गया है ?
उत्तर :
ओ३म् द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्तिराप:, शान्तिरोषधय: शान्ति: ।
वनस्पतय: शान्तिर् विश्वे देवा: शान्तिर् ब्रह्म शान्ति: सर्वं शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि ।।
ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति: ।।
प्रश्न : वेद मे आदर्श राष्ट्र की प्रजा के कर्तव्य के संबंध मे कौनसा मंत्र दिया गया है ?
उत्तर :
आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् ।
आ राष्ट्रे राजन्य: शूर इषव्योऽव्याधी महारथो जायताम् ।
दोग्ध्री धेनुर् वोढानड् वानाशु:, सप्ति: पुरन्धिर् योषा जिष्णू रथेष्ठा:, सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम्।
निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ऽ ओषधय: पच्यन्तां योगक्षेमो न: कल्पताम् ।।
यजुर्वेद २२.२२
हे भगवान इस राष्ट्र मे रहनेवाले ब्राह्मण लोग ( विद्या अध्ययन अध्यापन करनेवाले और संशोधन कार्य करनेवाले लोग ) विद्या और संशोधन कार्य को बढावा देनेवाले होवे ।
इस राष्ट्र के राजा, क्षत्रिय ( राष्ट्र का रक्षण करनेवाले लोग ) और अन्य प्रजाजन शूरवीर, व्याधिरहीत और रथ आदी आधुनिक यंत्रों से सज्य होवे ।
राष्ट्र मे भरपूर दूध देनेवाली गाये हो, जो सभी प्रकार की दरीद्रता और व्याधीयों को नष्ट करे, प्रजा सात प्रकार के रक्षा प्रणाली से संरक्षित हो और व्यापारी रथ आदी आधुनिक यंत्रों की मदत से सुदूर प्रदेशों से व्यापार करने मे सक्षम होवे ।
राष्ट्र की पंचायत सभाओं मे युवा वर्ग और अनुभवी वयोवृध्द प्रजाजन हो और वह सभी वीर पुरूष हो ।
समय - समय पर वर्षा हो, जिससे भरपूर फसल हो और औषधी वनस्पत्ती हो जिससे सभी प्रजाजनों के कष्टों को कई युगों तक नष्ट कीया जा सके।
उपरोक्त यजुर्वेद के मंत्र मे एक शक्तीशाली राष्ट्र के लिए किस प्रकार के प्रजाजन का होना आवश्यक है इसके बारे मे अपेक्षाए की गई है और मार्गदर्शन किया गया है। उपरोक्त उद्देशों को सामने रखकर ही आदर्श और संस्कारीत पिढी का निर्माण करने का मार्गदर्शन इस वेद मंत्र मे कीया गया है और इस उद्देश्य को प्रजाजन कभी न भूले इस कारण इस वेद मंत्र को वैदिक राष्ट्रगीत के रूप मे अपनाया गया है।
जयघोष
जो ऽ ऽ बोले सो अभय…..
सत्य सनातन वैदिक हिंदू धर्म की जय,
वेद की ज्योति …. जलती रहे,
ओ३म का झेंडा …. ऊंचा रहे,
गौ माता की…….. जय,
सब संतन की …...जय,
भारत माता की ….जय
वैदिक जप मंत्र
ओ३म् परब्रह्म परमेश्वराय नमो नम:
ओ३म् सचिदानंद स्वरूपाय नमो नम:
ओ३म् भूर्भुव: स्व:।
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न: प्रचोदयात् ।।
यजु ३६.३
वैदिक हिंदू धर्म के मुख्य उपदेश
एकम् सत् विप्रा बहुदा वदंती - ऋग्वेद
चरैवेति, चरैवेति - वेद
वसुधैव कुटुंबकम - उपनिषद
यत् पिंडे, तत् ब्रह्मांडे -
सा विद्या, या विमुक्तये -
शरीर माध्यम खलु धर्म साधनम् -
सत्यं शिवं सुन्दरम् -
मनुर्भव -