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वैदिक धर्मग्रंथों की वैज्ञानिकता, नैसर्गिकता और नश्वरता

वैदिक धर्मग्रंथो की वैज्ञानिकता, नैसर्गिकता और नश्वरता


            हमे हिंदू धर्म के वैदिक धर्मग्रंथो को वैज्ञानिक आधार पर सिखना बहुत जरूरी है, क्योकी, हिंदू धर्म के वैदिक धर्मग्रंथो मे बताए गए सिध्दांत और तत्वज्ञान यह हमारे युवा पिढी को शारिरीक, मानसिक, बौध्दीक, और आत्मिक स्तर पर शक्तीशाली बनाते है। यह ज्ञान युवकों की गुण ग्रहण करने की क्षमता, नये विषयों का विश्लेषण करने की क्षमता, सत्य को समझने की क्षमता, यादास्त क्षमता, विषयों को प्रस्तुत करने की क्षमता, विचारों की स्पष्टता, मुखमंडल का तेज और आत्मविश्वास इन सब को असाधारण रूप से बढता है। 


          जीवन मे हमारे विचारों की स्पष्टता ही हमे मानसिक और शारिरीक दृष्टी से मजबूत बनाती है। हिंदू धर्म शास्त्रों का दायरा बहुत बडा है। उनमे से मूलभूत वैदिक धर्मग्रंथो मे ही हिंदू धर्म का सही वैज्ञानिक ज्ञान छुपा है। यह ज्ञान सृष्टी के निर्माण के साथ ही हमे मिला है, जो हमे निसर्गपूरक आनंदी जीवन जीने का मूलभूत तरीका सिखाता है। इस कारण इस मूलभूत ज्ञान से युवा पिढी को गुरू-शिष्य परंपरा और समूह साधना के माध्यम से परिचित कराना और लाभान्वित कराना, यह हमारा मुख्य उद्देश है।


        वैदिक हिंदू धर्म का ज्ञान यह बहुत विस्तृत और सूक्ष्म है, इस कारण इस को सही तरीके से समझने के लिए आपको संशोधनवृत्ती के साथ परिश्रमी और प्रज्ञावंत होना बहुत आवश्यक है। इसके साथ ही आपको योग्य गुरू के मार्गदर्शन मे आपकी ग्रहण पात्रता को विस्तृत बनाना आवश्यक है। वेदोंने सृष्टी को और हमारे शरीर को ही महागुरू कहा है। वेदोंने तो संपूर्ण ज्ञान का सही श्रोत हमे एक वाक्य मे ही बता दिया है और वह वाक्य है, “यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे”। इसलिए वेदों का ज्ञान यह संपूर्ण सृष्टी के मूलतत्त्व का ज्ञान है, और उसका स्वरूप सचिदानंद स्वरूप है, जिसकी अनुभूती हर एक प्रज्ञावंत को कम या अधिक मात्रा मे, किसी ना किसी समय जरूर होती है। 

        वैदिक धर्मग्रंथों मे दिया गया ज्ञान यह एक सृष्टी की अदृश्य शक्ती है, जो प्रज्ञावंत लोगों के हृदय मे समय समय पर तप साधना द्वारा प्रकट होता है, यही कारण है की, हिंदू धर्म का ज्ञान कभी नष्ट नही हो सकता। वह केवल लुप्त होता है और जबभी, कोई प्रज्ञावंत सच्चे मन से सचिदानंद की प्राप्ती का प्रयास करता है, तबसे ही उसे वेदों का ज्ञान प्राप्त होना प्रारंभ हो जाता है। यही कारण है की, हिंदू धर्म मे जीवन का अंतिम उद्देश मोक्ष यानी सचिदानंद की प्राप्ती, यह बताया गया है, न की धन और लक्ष्मी की प्राप्ती। 

                                              

                                                ओ३म  सचिदानंदाय नमो नम:। 



दिनांक : 22.02.2022                                                                                   योगी ब्रह्मप्रकाश वानप्रस्थी