वैदिक समाज व्यवस्था मे वंश ऋषी एवं गोत्र का महत्व
प्रज्ञावंत समाज निर्मिती के दृष्टीकोण से वैदिक हिंदू समाजने विवाह संबंधी एक व्यवस्था बनाई गई थी, जिसे गोत्र व्यवस्था कहते है। इस व्यवस्था को समाज के सर्वांगीण विकास के लिए समर्पित गुरूकुलों के ऋषी एवं महर्षीओं का आधार लिया गया। इसके लिए इन महान ऋषी एवं महर्षीओं के सामाजिक कार्य और स्वभाव गुणों के आधार पर उनके माननेवाले परीवारों को उनके ऋषी या गोत्र का चयन करने का अधिकार दिया गया और सगोत्र विवाह पर निर्बंध डाला गया। क्योकी इन ऋषीओं के गुरुकुल एवं कार्यक्षेत्र यह विभिन्न प्रदेशों मे होते थे इस वजह से गोत्र व्यवस्था के कारण भारतीय समाज मे सुदूर प्रदेशों से नवनविन संबंध निर्माण होते रहे। इस व्यवस्था से समाज को यह लाभ होता है की, समाज के लोग सुदूर प्रदेशों की भौगोलिक और वैचारिक विविधता का लाभ उठा सकते है और इससे वैदिक संस्कृती सुदूर प्रदेशों मे प्रचारीत होती है। इस व्यवस्था से समाज का संघटन विकसित और मजबूत होता है। विपत्ती के समय सुदूर प्रदेशों से सहाय्यता मिलने की संभावना बनी रहती है। सब से महत्वपूर्ण यह है की, सुदूर प्रदेशों के नैसर्गिक गुणों का आपस मे मिलन होने से उत्तम, सुदृढ एवं प्रज्ञावंत प्रजा का निरंतर निर्माण होता रहता है। वैदिक संस्कृती की इन विशिष्टताओं को पुनर्स्थापित करके उत्तम, सुदृढ एवं प्रज्ञावंत प्रजा का निर्माण निरंतर होता रहे, इस उद्देश से ‘वंशावली डॅाट कॅाम’ यह इस वैशिष्टयपूर्ण और वैज्ञानिक गोत्र प्रणाली का पुनर उत्थान करने का विशेष प्रयास कर रहा है।
वंशावली डॅाट कॅाम मे हम व्यक्ती से उनके पूर्वजों के वंश और गोत्र की जानकारी लेते है। साथ ही हम विवाह योग्य वर - वधू के आरोग्य, मान्यताए, संस्कार एवं आर्थिक स्थिती संबंधी अधिक से अधिक जानकारी लेने का प्रयास करते है। क्योकी भारतीय वैदिक समाज व्यवस्था और संस्कृती मे विवाह कार्यो के समय इन जानकारीओं को बहुत महत्व दिया जाता है। इसके पिछे वैज्ञानिक कारण भी है, वह यह है की, वर-वधू से उत्पन्न संतान यह, कोईभी शारीरिक व्यंग रहित हो, सुंदर, सबल, बुध्दीमान, एवं शारिरीक - मानसिक और आत्मिक दृष्ट्या सुदृढ एवं प्रज्ञावान हो इसके लिए वर-वधू दोनो के माता - पिता के गोत्र या वंश एक नही होने चाहिए । आधुनिक विज्ञान की खोजों मे भी यह पाया गया है की, वर और वधू यह एक ही गोत्र के होने से, नजदिकी रिश्ते मे होने से और नजदिकी प्रदेश के होने से उनको होनेवाली संतान यह शारीरिक और मानसिक दृष्टी से विकलांग, विकृत एवं कमजोर होने की संभावना बहुत जादा होती है। यही कारण है की प्रज्ञावंत प्रजा के निर्मिती के लिए विवाह करने वाले वर-वधू का चयत करते समय निम्न नियमों को ध्यान मे रखा जाना आवश्यक है …..
1. वर-वधू एकही माता से जन्मे हुए न हो।
2. वर-वधू का पिता एकही न हो।
3. वर-वधू एकही मातृ गोत्र या वंश मे जन्मे हुए न हो।
4. वर-वधू एकही पितृ गोत्र या वंश मे जन्मे हुए न हो।
5. वर-वधू एकही ग्राम, शहर या प्रदेश मे जन्मे हुए न हो।
6. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वर-वधू के जन्म पत्रिका के अधिक से अधिक गुण मिलते हो।
7. वर-वधू किन्ही दुर्धर रोग से ग्रस्त न हो।
8. वर-वधू उत्तम संस्कारी हो।
9. वर-वधू का विवाह दोनो की पसंती और खुशी से हो।
10. वर-वधू का विवाह दोनो परीवारों के और नजदिकी रिश्तेदारों की पसंती और खुशी से हो।
11. वर-वधू का विवाह संबंध तय करने मे किसी प्रकार का झल, कपट या आर्थिक शोषण न हो।
12. विवाह पश्चात भी दोनो परीवारों के संबंध परस्पर सम्मानजनक एवं आदरयुक्त हो।
गोत्र व्यवस्था के महान ऋषी कुल जिन्हे हम गुरूकूल भी कह सकते है, एैसे ऋषीकुलों के प्रवर्तक प्रमुख ऋषीओं की जानकारी ….
1. अत्रि - महर्षि अत्रि वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि हैं। सप्तर्षी मे से एक ऋषी ।सम्पूर्ण ऋग्वेद दस मण्डलों में प्रविभक्त है। प्रत्येक मण्डल के मन्त्रों के ऋषि अलग-अलग हैं। उनमें से ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि हैं। इसीलिये यह मण्डल 'आत्रेय मण्डल' कहलाता है। इस मण्डल में 87 सूक्त हैं। जिनमें महर्षि अत्रि द्वारा विशेष रूप से अग्नि, इन्द्र, मरूत, विश्वेदेव तथा सविता आदि देवों की महनीय स्तुतियाँ ग्रथित हैं। इन्द्र तथा अग्निदेवता के महनीय कर्मों का वर्णन है। अत्रि ब्रह्मा के पुत्र थे जो उनके नेत्रों से उत्पन्न हुए थे। ये सोम के पिता थे जो इनके नेत्र से आविर्भूत हुए थे। इन्होंने कर्दम की पुत्री अनुसूया से विवाह किया था। इन दोनों के पुत्र दत्तात्रेय थे। पुत्रोत्पत्ति के लिए इन्होंने ऋक्ष पर्वत पर पत्नी के साथ तप किया था। इन्होंने त्रिमूर्तियों की प्रार्थना की थी जिनसे त्रिदेवों के अशं रूप में दत्त (विष्णु) दुर्वासा (शिव) और सोम (ब्रह्मा) उत्पन्न हुए थे। बनवास के समय राम अत्रि के आश्रम भी गये थे।
2. अंगिरस - महर्षि अंगिरा ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों में से एक माने जाते हैं। इन्हें प्रजापति भी कहा गया है और सप्तर्षियों में वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा मरीचि आदि के साथ इनका भी परिगणन हुआ है। अथर्ववेद के प्रणेता। इनके दिव्य अध्यात्मज्ञान, योगबल, तप-साधना एवं मन्त्रशक्ति की विशेष प्रतिष्ठा है। इनकी पत्नी दक्ष प्रजापति की पुत्री स्मृति (मतान्तर से श्रद्धा) थीं, जिनसे इनके वंश का विस्तार हुआ।
3. अगस्त्य - महर्षि अगस्त्य वैदिक ॠषि थे। ये वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई थे। उनका जन्म श्रावण शुक्ल पंचमी (तदनुसार 3000 ई.पू.) को काशी में हुआ था। वर्तमान में यह स्थान अगस्त्यकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा विदर्भ देश की राजकुमारी थीं, जो विद्वान और वेदज्ञ थीं। अगस्त्य को सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। देवताओं के अनुरोध पर उन्होंने काशी छोड़कर दक्षिण की यात्रा की और बाद में वहीं बस गये थे। ब्रह्मतेज के मूर्तिमान स्वरूप महामुनि अगस्त्य जी का पावन चरित्र अत्यन्त उदात्त तथा दिव्य है। वेदों में उनका वर्णन आया है।
4. वशिष्ठ - वसिष्ठ वैदिक काल के विख्यात ऋषि थे। वसिष्ठ एक सप्तर्षि हैं। उनकी पत्नी अरुन्धती है। वह योग-वासिष्ठ में राम के गुरु और राजा दशरथ के राजकुल गुरु भी थे। वसिष्ठ अर्थात आर्यों की पुरातन ओजस्वी संस्कृति के स्रष्टाओं में से एक अपूर्व स्रष्टा। 'वस' धातु श्रेष्ठत्व का सूचक है। वसिष्ठ का अर्थ है सबसे प्रकाशवान, सबसे उत्कृष्ट, सबमें श्रेष्ठ और महिमावंत। आदि वसिष्ठ को ब्रह्मा का मानस पुत्र, प्रजापतियों में एक कहा गया है। स्वयंभू मन्वंतर में वे ब्रह्मा की प्राणवायु से उत्पन्न हुए थे। बाद के वैवस्वत मन्वंतर में ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में अग्नि के मध्य भाग से उत्पन्न हुए। महर्षि वसिष्ठ ने सूर्यवंश का पौरोहित्य करते हुए अनेक लोक-कल्याणकारी कार्यों को सम्पन्न किया। इन्हीं के उपदेश के बल पर भगीरथ ने प्रयत्न करके गंगा-जैसी लोक कल्याणकारिणी नदी को हम लोगों के लिये सुलभ कराया। दिलीप को नन्दिनी की सेवा की शिक्षा देकर रघु-जैसे पुत्र प्रदान करने वाले तथा महाराज दशरथ की निराशा में आशा का संचार करने वाले महर्षि वसिष्ठ ही थे।
5. विश्वामित्र - विश्वामित्र गाधि के पुत्र थे। विश्वामित्र अपने समय के वीर और ख्यातिप्राप्त राजाओं में गिने जाते थे। लम्बे समय तक राज्य करने के बाद वे पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकले। पुरुषार्थ, सच्ची लगन, उद्यम और तप की गरिमा के रूप में महर्षि विश्वामित्र के समान शायद ही कोई हो। इन्होंने अपने पुरुषार्थ से, अपनी तपस्या के बल से क्षत्रियत्व से ब्रह्मत्व प्राप्त किया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि बने, देवताओं और ऋषियों के लिये पूज्य बन गये। विश्वामित्र को सप्तर्षियों में अन्यतम स्थान प्राप्त हुआ था। अपनी तपस्या के बल और योग से वे सभी के लिए वन्दनीय भी बन गय थे।
6. भृगु - महर्षि भृगु ब्रह्मा जी के नौ मानस पुत्रों में अन्यतम हैं। एक प्रजापति भी हैं और सप्तर्षियों में इनकी गणना है। सुप्रसिद्ध महर्षि च्यवन इन्हीं के पुत्र हैं प्रजापति दक्ष की कन्या ख्याति देवी को महर्षि भृगु ने पत्नी रूप में स्वीकार किया, जिनसे इनकी पुत्र-पौत्र परम्परा का विस्तार हुआ। महर्षि भृगु का जन्म जिस समय हुआ,उस समय इनके पिता प्रचेता सुषानगर जिसे कालान्तर मे पर्शिया,ईरान कहा जाने लगा है इसी भू-भाग के राजा थे। इस समय ब्रह्मा पद पर आसीन प्रचेता के पास उनकी दो पत्नियां रह रही थी। पहली भृगु की माता वीरणी दूसरी उरपुर की उर्वसी जिनके पुत्र वशिष्ठ जी हुए।
7. जमदग्नि - जमदग्नि एक परम तेजस्वी ऋषि, जो 'भृगुवंशी' ऋचीक के पुत्र थे तथा जिनकी गणना 'सप्तऋषियों' में होती है। इनकी पत्नी राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका थीं। भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र परशुराम थे, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। जमदग्नि की पत्नी रेणुका जब एक गन्धर्व पर आसक्त हो गई, तब वे अपने पुत्रों को रेणुका का वध करने का आदेश देते हैं। परशुराम अपनी माता का सिर काट देते हैं, किंतु बाद में पिता से कहते हैं कि वह माता रेणुका को क्षमा करके पुन: उनकी चेतना लौटा दें। जमदग्नि ऋषि का जन्म भृगुवंशी ऋचीक के यहाँ पुत्र रूप में हुआ था। जमदग्नि की पत्नी राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका थीं। जमदग्नि ने अपनी तपस्या एवं साधना द्वारा उच्च स्थान प्राप्त किया था, जिससे सभी उनका आदर सत्कार करते थे। ऋषि जमदग्नि तपस्वी और तेजस्वी ऋषि थे। उनके और रेणुका के पाँच पुत्र थे- 'रुक्मवान', 'सुखेण', 'वसु', 'विश्ववानस' और 'परशुराम'।
8. भारद्वाज - सप्तर्षी मे स्थान प्राप्त ।महर्षि भारद्वाज ऋग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा कह गये हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का अति उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज कहते हैं अग्नि को देखो, यह मरणधर्मा मानवों में मौजूद अमर ज्योति है। यह अग्नि विश्वकृष्टि है अर्थात् सर्वमनुष्य रूप है। यह अग्नि सब कर्मों में प्रवीणतम ऋषि है, जो मानव में रहती है, उसे प्रेरित करती है ऊपर उठने के लिये। अत: पहचानो। मानवी अग्नि जागेगी। विश्वकृष्टि को जब प्रज्ज्वलित करेंगे तो उसे धारण करने के लिये साहस और बल की आवश्यकता होगी। इसके लिये आवश्यक है कि आप सच्चाई पर दृढ़ रहें। ऋषि भारद्वाज कहते हैं- 'हम अन्याय के आगे झुकें नहीं। क्रूर-दुष्ट-हिंसक-दस्यु के आगे भी हमारा सिर झुके नहीं'। ऋषि समझाते हैं कि जीभ से ऐसी वाणी बोलनी चाहिये कि सुनने वाले बुद्धिमान बनें। हमारी विद्या ऐसी हो, जो कपटी दुष्टों का सफाया करे, युद्धों में संरक्षण दे, इच्छित धनों का प्राप्त कराये और हमारी बुद्धियों को निन्दित मार्ग से रोके। भारद्वाज ऋषि का विचार है कि हमारी सरस्वती, हमारी विद्या इतनी समर्थ हो कि वह सभी प्रकार के मानवों का पोषण करे। 'हे सरस्वती! सब कपटी दुष्टों की प्रजाओं का नाश कर। हे सरस्वती! तू युद्धों में हम सबका रक्षण कर। हे सरस्वती! तू हम सबकी बुद्धियों की सुरक्षा कर। इस प्रकार भारद्वाज के विचारों में वही विद्या है, जो हम सबका पोषण करे, कपटी दुष्टों का विनाश करे, युद्ध में हमारा रक्षण करे, हमारी बुद्धि शुद्ध रखे तथा हमें वाञ्छित अर्थ देने में समर्थ हो। ऐसी विद्या को जिन्होंने प्राप्त किया है, ऋषि का उन्हें आदेश है- अरे, ओ ज्ञान को प्रत्यक्ष करने वाले! प्रजाजनों को उस उत्तम ज्ञान को सुनाओ और जो दास हैं, सेवक हैं, उनको श्रेष्ठ नागरिक बनाओ। ज्ञानी, विज्ञानी, शासक, कुशल योद्धा और राष्ट्र को अभय देने वाले ऋषि भरद्वाज के ऐसे ही तीव्र तेजस्वी और प्रेरक विचार हैं।
9. कश्यप - सप्तर्षी मे स्थान प्राप्त। कश्यप नाम के कई ऋषि हुए हैं जिनमें से एक की गणना प्रजापतियों में होती है। इस ऋषि ने दक्ष की दिति, अदिति, दनु आदि नाम की ग्यारह कन्याओं से विवाह किया था। अदिति के गर्भ से देवता उत्पन्न हुए। दिति ने दैत्यों को और दनु ने दानवों को जन्म दिया। कश्यप एक गोत्र का नाम भी है। यह गोत्र इतना व्यापक है कि जिसके गोत्र का पता नहीं चलता, उसका गोत्र कश्यप मान लिया जाता है क्योंकि सभी जीव-धारियों की उत्पत्ति कश्यप से ही मानी जाती है।
10. गौतम - सप्तर्षी मे स्थान प्राप्त। गौतम जिन्हें 'अक्षपाद गौतम' के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है, 'न्याय दर्शन' के प्रथम प्रवक्ता माने जाते हैं। इनकी पत्नी का नाम अहल्या और पुत्र तथा पुत्री के नाम क्रमश: शतानन्द व विजया थे। अक्षपाद गौतम ने 'न्याय दर्शन' का निर्माण तो शायद नहीं किया, पर यह कहा जा सकता है कि न्याय दर्शन का सूत्रबद्ध, व्यवस्थित रूप अक्षपाद के 'न्यायसूत्र' में ही पहली बार मिलता है। महर्षि गौतम परम तपस्वी एवं संयमी थे। महाराज वृद्धाश्व की पुत्री अहिल्या इनकी पत्नी थी, जो महर्षि के शाप से पाषाण बन गयी थी। त्रेता युग में भगवान श्रीराम की चरण-रज से अहिल्या का शापमोचन हुआ, जिससे वह पाषाण से पुन: ऋषि पत्नी बनी।
11. कण्व - प्राचीन भारत में 'कण्व' नाम के अनेक व्यक्ति हुए हैं, जिनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध महर्षि कण्व थे, जिन्होंने अप्सरा मेनका के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र की कन्या शकुंतला को पाला था। देवी शकुन्तला के धर्मपिता के रूप में महर्षि कण्व की अत्यन्त प्रसिद्धि है। महाकवि कालिदास ने अपने 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' में महर्षि के तपोवन, उनके आश्रम-प्रदेश तथा उनका, जो धर्माचारपरायण उज्ज्वल एवं उदात्त चरित प्रस्तुत किया है, वह अन्यत्र उपलब्ध नहीं होता। उनके मुख से एक भारतीय कथा के लिये विवाह के समय जो शिक्षा निकली है, वह उत्तम गृहिणी का आदर्श बन गयी। महर्षि कण्व शकुन्तला की विदाई के समय कहते हैं- "शुश्रुषस्व गुरुन् कुरु प्रियसखीवृत्तिं सपत्नीज ने पत्युर्विप्रकृताऽपि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गम:। भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा: कुलस्याधय:॥"
12. कपील - कपिल मुनि 'सांख्य दर्शन' के प्रवर्तक थे, जिन्हें भगवान विष्णु का पंचम अवतार माना जाता है। इनकी माता का नाम देवहुती व पिता का नाम कर्दम था। कपिल मुनि की माता देवहूती ने विष्णु के समान पुत्र की कामना की थी। अतः भगवान विष्णु ने स्वयं उनके गर्भ से जन्म लिया था। कर्दम जब सन्न्यास लेकर वन जाने लगे तो देवहूती ने कहा, "स्वामी मेरा क्या होगा?" इस पर ऋषि कर्दम ने कहा कि "तेरा पुत्र ही तुझे ज्ञान देगा।" समय आने पर कपिल ने माता को जो ज्ञान दिया, वही 'सांख्य दर्शन' कहलाया। अपने सांख्य दर्शन में कपिल मुनि ने कर्मकांड के विपरीत ज्ञानकांड को महत्व दिया। उनके पहले कर्म को ही एक मार्ग माना जाता था और ज्ञान केवल चर्चा तक सीमित था। त्याग, तपस्या और समाधि को भारतीय संस्कृति में प्रतिष्ठित कराने का श्रेय कपिल मुनि को ही है। विकासवाद का सर्वप्रथम प्रतिपादन करके उन्होंने संसार को स्वाभाविक गति से उत्पन्न माना। ये सृष्टि के किसी अति प्राकृतिक कर्त्ता को नहीं मानते। ईश्वर का विशेष उल्लेख न होने के कारण कुछ विद्वान् 'सांख्य दर्शन' को अनीश्वरवादी मानते हैं।
13. शांडिल्य - शांडिल्य एक ब्राह्मण गोत्र है, ये वेदाध्ययन करने वाले ब्राह्मण हैं। यह गोत्र ब्राह्मणों के अनेक गोत्रों में से एक है। महाभारत अनुशासन पर्व के अनुसार युधिष्ठिर की सभा में विद्यमान ऋषियों में शाण्डिल्य का नाम भी है।
14. कौण्डिन्य -
15. मुदगल -
16. पाराशर -
जो भी कोई व्यक्ती को अपना ऋषी कुल पता न हो वह व्यक्ती अपने स्वाभाव एवं गुणधर्म के साथ मेल खा रहे ऋषी को अपना कुल ऋषी चुन सकते है और उनके दिखाए गए मार्ग पर चल कर आपनी आध्यात्मिक और भौतिक उन्नती कर सकते है।