सत्य सनातन वैदिक धर्म परिचय प्रश्नोत्तरी - भाग 6 : आनंदी जीवन का त्तवज्ञान
प्रश्न : सत्य सनातन वैदिक धर्म जीवन किस तरह जीने का मार्गदर्शन करता है।
उत्तर : सत्य सनातन वैदिक धर्म जीवन को पूर्ण क्षमता के साथ और आनंद के साथ जीने के लिए सवित्तर मार्गदर्शन करता है।
प्रश्न : सत्य सनातन वैदिक धर्म जीवन को पूर्ण क्षमता के साथ और आनंद के साथ जीने के लिए कोनसा सवित्तर मार्गदर्शन करता है।
उत्तर : सत्य सनातन वैदिक धर्म जीवन को पूर्ण क्षमता के साथ और आनंद के साथ जीने के लिए निम्ना नुसार मार्गदर्शन करता है…..
सृष्टी की निर्मिती कैसे हुई एवं वैश्विक शक्ती ईश्वर किस तरह कार्य करता है और उस शक्ती को प्राप्त करने संबंधी जप, तप, त्याग, पुजा, यज्ञ, अष्टांग योग साधना, इत्यादी संबंधी सविस्तर मार्गदर्शन वैदिक साहित्यों मे किया गया है।
मनुष्य ने उत्तम समाज और राष्ट्र के लिए किस तरह संस्कारीत पिढी का निर्माण करने संबंधी ज्ञान।
उत्तम समाज व्यवस्था एवं उत्तम राष्ट्र व्यवस्था संबंधी ज्ञान।
उत्तम कुटूंब व्यवस्था कैसी होनी चाहिए।
उत्तम वास्तु निर्माण कैसे होना चाहिए।
उत्तम भाषा और साहित्य कैसे होना चाहिए।
उत्तम संगीत, नृत्य और नाटक कैसे होना चाहिए।
काल गणना, अंक गणना, भूमी गणना, कैसी होनी चाहिए।
ग्रह- तारों की गती और उनके गुरुत्व का हमारे उपर होने वाले प्रभावों की गणना कैसे करनी चाहिए।
उत्तम कृषी, वन और औषधियों के निर्माण का ज्ञान।
हमारे आयु और आरोग्य संबंधी ज्ञान।
दैनिक दिनचर्या, ऋतुचर्या, ऋतु उत्सव एवं तैव्हारों संबंधी ज्ञान
उपरोक्त अनुसार मनुष्य जीवन को पूर्ण क्षमता के साथ और आनंद के साथ जीने के लिए ईश्वर ने वैदिक साहित्य के द्वारा सवित्तर मार्गदर्शन किया गया है। इसलिए प्रत्येक बालक को यज्ञोपवित संस्कार करके गुरुकुल मे जाकर वैदिक ज्ञान प्राप्त करने का स्पष्ट निर्देश सत्य सनातन घर्म द्वारा दिए गए सोलह संस्कारों मे दिए गए है।
गुरूकुल मे गुरू शिष्यों को सबसे पहले परिश्रम करना और दैनिक संध्या, यज्ञ, अष्टांग योग, इत्यादी साधना सिखाते थे। उसके पश्चात बालक के परिवार से संबंधीत विद्या और सर्वसाधारण व्यहारीक विद्याए सिखाते थे। इसके बाद शिष्य को उसकी अभिरूची और क्षमता के अनुसार विशेष विद्याए सिखाते थे। इस तरह सत्य सनातन धर्म मे प्रत्येक बालक को वैदिक शिक्षा द्वारा एक उत्तम मनुष्य बनाकर एवं एक उत्तम नागरीक बनाकर संपूर्ण आनंददायी और सुरक्षित समाज और राष्ट्र का निर्माण करने का प्रयास किया जाता है।
सत्य सनातन धर्म के अनुसार मनुष्य जीवन का उद्देश सात्विक आनंद को प्राप्त करना यह है। और मनुष्य को सात्विक आनंद यह प्रकृती पूरक, राष्ट्र पूरक और समाज पूरक कार्य करने से ही प्राप्त होता है एैसा सभी वैदिक साहित्यों मे बताया गया है।
परब्रह्म सात्विक उर्जा सिध्दांत -
आदिशक्ती परब्रह्म परमेश्वर, प्रकृती और पिंड का ज्ञान
सत्य सनातन वैदिक धर्म के नुसार संपूर्ण विश्व यह वैसे तो केवल परमेश्वर या परब्रह्म या आदिशक्ती तत्व इस अप्रकट या अदृष्य शक्ती से ही बना है। परंतु इस अदृष्य शक्ती को दृश्य स्वरूप या प्रकट स्वरूप मे लाने के लिए प्रकाश स्वरूप प्रकट उर्जा का निर्माण किया गया और इस प्रकट उर्जा के माध्यम से भौतिक सृष्टी जो मनुष्य को उसकी दृष्टी ( ॲाखे ) से दिखाई देती है, का निर्माण किया गया और इस भौतिक सृष्टी को चैतन्यमयी बनाने के लिए जीव तत्व या प्राण तत्व या चैतन्य तत्व से अनुप्राणित करके सजीव बनाया गया है। इसलिए आदिशक्ती परब्रह्म परमेश्वर शक्ती से ही प्रकृती ( स्थिर चैतन्य जीव जैसे वृक्ष, इत्यादी ) और पिंड ( प्राणी ) बने है, जिसमे मनुष्य प्राणी का भी समावेश है। इसलिए परमेश्वर ने हमे जन्म के साथ ही जो अमूल्य संम्पत्ती दी है वह है हमारा यह मनुष्य शरीर और यह संपूर्ण प्रकृती है। हमे इस दोनो के माध्यम से परमेश्वर की इस परम् आनंददायी कार्य को समझना है और उसका संयमित उपभोग लेते हुए उस आदिशक्ती परमेश्वर परब्रह्म के प्रती धन्यवाद भाव धारण करना है। यही ज्ञान है, जो संपूर्ण वैदिक साहीत्य द्वारा आदिशक्ती परब्रह्म परमेश्वर ने हमे दिया है।
सतो गुण उर्जा, रजो गुण उर्जा और तमो गुण उर्जा
सत्य सनातन वैदिक धर्मा नुसार प्रकृतीचे संचलन हे सतो गुण, रजो गुण आणि तमो गुण या तीन गुणांचे किंवा या तीन प्रकारचे उर्जांचे योग्य समन्वया द्वारे होते. हीच बाब मानव समाजाचे संचलन, राज्य शासनाचे संचलन किंवा मग आपल्या शरीराचे संचलन या सर्वां करीता आवश्यक ठरते. म्हणून आध्यात्मिक प्रगती करीता सतो गुणी उर्जेचा विकास करणे आवश्यक असते हे जरी खरे असले तरी रजो गुणी आणि तमो गुणी उर्जेचे महत्व देखील आपल्या वैयक्तिक जीवना मधे वेळेवेळी आवश्यक ठरते. सत्य सनातन वैदिक धर्मा मधे ठिकठिकाणी अविद्येचा नाश करण्याचे तसेच अधर्मी व्यक्तीना धर्माचे व शांततामय समाजाचे शत्रु समजून त्यांचा नाश करण्याचे स्पष्ट आदेश दिलेले आहेत. तुम्ही स्वत: कितीही सतो गुणी असले तरी तुम्हाला इतर रजो गुणी व तमो गुणी लोग हे समाजात शांततेने राहू देत नाही. त्या करीता तुम्ही देखील सतो गुणी लोकांचे संघटन करून राहिले पाहिजे आणि योग्य वेळी शास्त्र आदेशा नुसार रजो गुणी व तमो गुणी लोकांना दंड देण्या करीता तुमचे मधील रजो गुण व तमो गुण वेळोवेळी जागृत केला पाहिजे. परंतु अनेक धर्म गुरूंनी अहिंसा तत्वाचा सहारा स्वत:चा अशक्तपणा व आळस लपविण्या करीता केला असल्याचे दिसून येते आणि दुष्ट निर्दलनाचे कार्य पूर्णत: देवावर सोडून स्वत: दूष्टांचे पारतंत्र्य स्वीकारून आपले कुटूंब, समाज आणि राष्ट्राला अनंत दु:खात लोटले असल्याचे इतिहासांत दिसून येते. त्यामुळे समाजाने देखील धर्मगुरूंचे उपदेशांवर अंधपणे अवलंबून न राहता त्याच्या उपदेशांना राष्ट्रहीत आणि समाजहिताचे कसोटीवर तपासून पाहिले पाहिजे.
उपरोक्त प्रमाणे सतो गुण, रजो गुण आणि तमो गुण यांचे संतुलित महत्व लक्षात घेवून प्रत्येक व्यक्तीने आपल्या आध्यात्मिक जीवनातील उन्नती करीता सतो गुणांचे विकासाचा मार्ग निवडला पाहिजे. कारण सतो गुणांच्या मदतीनेच तुम्ही आयुष्यात सचिदानंदाची प्राप्ती करू शकता आणि सतो गुणी उर्जा म्हणजेच सात्विक उर्जा हीच तुम्हाला चिरकाल शांती व आनंद प्राप्त करून देवू शकते. म्हणूनच सत्य सनातन वैदिक धर्मात “ सत्यं शिवं सुंदरं ” हा सात्विक उर्जेची महती सांगणारा उर्जा मंत्र दिलेला आहे.
शरीरा मधे उर्जा निर्मिती, वितरण, उपयोग एवं संग्रहण तंत्र -
उर्जा निर्मिती
शरीरा मधे उर्जा निर्मिती के केंद्र और उनका उर्जा निर्मिती का प्रमाण
आत्मा - 5 % - आनंदमय कोष
मस्तिष्क - प्रसन्नता, शरीर उर्जा नियंत्रण, शरीर नवनिर्माण - 10 % - आनंदमय कोष
बुध्दी - विचार ( विद्युत लहरी ) 5 % - विज्ञानमय कोष
मन - ईच्छा, निर्धार ( विद्युत लहरी ) 10 % मनोमय कोष
नासिका - गंध, ( वायू रस लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
कर्ण - आकाश, ध्वनी, वायू, विचार ( वायू लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
चक्षु - रंग, रूप, रस ( प्रकाश लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
कंठ - स्वर, ध्वनी, वायू ( वायू लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
त्वचा - स्पर्श, सूर्य किरण, उष्णता, थंड ( विद्युत लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
जिव्हा - रसना, ( रस लहरी ) 5 % - अन्नमय कोष
पाचन क्षमता - जल, भूमी तत्व ( रस विद्युत लहरी ) 40 % अन्नमय कोष
शरीर उर्जा का व्यय
उपरोक्त अनुसार हमने शरीर मे उर्जा के निर्मिती के बारे मे तो जाना है, परंतु इस निर्मिती उर्जा के खर्च के बारे मे भी हमे जानकारी होना बहुत आवश्यक है। यह जानकारी निम्ना नुसार दि जा रही है ….
शरीरा मे उर्जा खर्च के केंद्र और उनका उर्जा खर्च का प्रमाण….
आत्मा - 5 % - आनंदमय कोष
मस्तिष्क - प्रसन्नता, शरीर उर्जा नियंत्रण ( विद्युत ), शरीर नवनिर्माण 15 % - आनंदमय कोष
बुध्दी - विचार ( विद्युत लहरी ) 10 % - विज्ञानमय कोष
मन - ईच्छा, निर्धार ( विद्युत लहरी ) 35 % मनोमय कोष
नासिका - गंध, ( वायू रस लहरी ) 1 % - प्राणमय कोष
कर्ण - आकाश, ध्वनी, वायू, विचार ( वायू लहरी ) 2 % - प्राणमय कोष
चक्षु - रंग, रूप, रस ( प्रकाश लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
कंठ - स्वर, ध्वनी, वायू ( वायू लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
त्वचा - स्पर्श, सूर्य किरण, उष्णता, थंड ( विद्युत लहरी ) 5 % - प्राणमय कोष
जिव्हा - रसना, ( रस लहरी ) 2 % - अन्नमय कोष
पाचन क्षमता - जल, भूमी तत्व ( रस विद्युत लहरी ) 15 % अन्नम
अतिरिक्त शरीर उर्जा के संचय स्थान -
मांस - 10 % ( स्त्रियों मे 20 % ) ( कफ प्रकृती पुरूषों मे 20 % )
मेद - 10 % ( स्त्रियों मे 20 % ) ( कफ प्रकृती पुरूषों मे 20 % )
अस्थी - 10 % ( पुरूषों मे 20 % )
मज्जा - 10 %
शुक्र - 10 %
आभा - 20 % - संचय स्थान : मस्तिष्क एवं मुख मंडल
प्रतिभा - 30 % - संचय स्थान : संपूर्ण त्वचा, मस्तिष्क एवं मुख मंडल
सतो गुण - सात्विक उर्जा की वृध्दी
उपरोक्त सभी शरीर उर्जा निर्मिती केंद्रो द्वारा उर्जा निर्मिती की गती संतुलित तरीके से बढाने के लिए सत्य सनातन धर्म मे अष्टांग योग साधना नियमित करने को कहा गया है और साथ मे दैनिक हवन, पुजा, जप- तप और उपवास करने को कहा गया है। इन साधनाओं के माध्यम से हमारे उर्जा निर्मिती के केंद्र निचे से उपर की ओर अधिक कार्यान्वित करने होते है। यानी उपवास कर के आपको अन्नमय कोष से कम उर्जा लेने का और उपवास के साथ परमेश्वर का जप- तप कर के अन्य उच्च उर्जा के कोषों के संवाहकों को जागृत कर पर्यावरण मे मैजूद सात्विक उच्च उर्जा को अधिक से अधिक लेने का अभ्यास करना है। यही शारिरीक और मानसिक प्रक्रिया प्रत्येक वैदिक साहित्यों मे बताई गई है, जो पूर्णत: हमारे शरीर विज्ञान पर खरी उतरती है। यह उच्चस्तरीय सात्विक उर्जा की प्राप्ती ही हमे परम् शक्ती, शांती और आनंद को प्रदान करती है। सत्य सनातन वैदिक धर्म मे यह पूर्णत: शरीर विज्ञान और बाह्य प्रकृती के सभी विज्ञानो को सूक्ष्मता से समझ कर एक वैज्ञानिक जीवन शैली का निर्माण कीया गया है, आज की पिढी को सही तरीके से समझ कर लेना होगा, तब ही वह भी इस परम् ज्ञान और जीवन शैली मे स्थिर होकर वेद मे कहे नुसार सौ वर्ष तक आनंदी और निरोगी जीवन का आनंद ले सकेंगे।
अष्टांग योग साधना -
१. यम - अहींसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
२. नियम - शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान
३. आसन -
४. प्राणायम -
५. प्रत्याहार -
६. धान -
७. धारणा -
८. समाधी -
उपरोक्त तत्वों के पालन से सात्विक उर्जा की निर्मिती मे बहुत मदत होती है।
मदत कैसे - उर्जा कम खर्च, कार्य समाधान, उर्जा निर्मिती मे वृध्दी
परंतु उसके लिए राष्ट्र, समाज और व्यक्ती इन सब का सात्विक चरित्र निर्माण होना आवश्यक है।
अगर राष्ट्र, समाज और व्यक्ती इन सब का चरित्र निर्माण गंधर्व, राजसी, तामसी, राक्षसी या पिशाच स्वरूप का हो तो एैसे जगहो पर सात्विक उर्जा या सात्विक आनंद की निर्मिती संभव नही है।
इसलिए प्रत्येक व्यक्ती, कुटूंब, समाज और राष्ट्र का प्रथम कर्तव्य सत्यवादी, पर्यावरण पूरक, और सात्विक चरित्र निर्माण करना यह है। इस निर्माण विधी के नियमो ही सत्य सनातन वैदिक धर्म मे दिए गए है।
सत्य सनातन धर्म के योग शास्त्र और शरीर विज्ञान शास्त्रों मे मनुष्य शरीर के उपरोक्त उर्जा निर्मिती केंद्रों को उर्जा निर्मिती के पांच कोषों मे विभाजित किया गया है, वह निम्ना नुसार है……..
१. अन्नमय कोष - संपूर्ण पाचन तंत्र, जो अन्न से उर्जा निर्माण करता है।
२. प्राणमय कोष - संपूर्ण श्वसन यंत्रणा, जो वायू द्वारा शरीर के लिए आवश्यक उर्जा की निर्मिती करता है।
३. मनोमय कोष - हमारे मन मे निर्माण होनेवाले विचार और ईच्छाए जो हमारे शरीर मे सुख, समाधान, आनंद, दु:ख, काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर, जैसे भावों को निर्माण करके शरीर मे उर्जा निर्मिती कार्य मनोमय कोष द्वारा होता है।
४. विज्ञानमय कोष - यह हमारे शरीर मे की चौकस बुध्दी यंत्रणा है, जो हमारे शरीर के सुरक्षा प्रणाली संबंधी और हमारी जानने की जिज्ञासा संबंधी आवश्यक उर्जा का निर्माण करती है।
५. आनंदमय कोष - यह हमारे शरीर का सर्वोच्च और मूलभूत आत्ममय या सचिदानंदमय कोष है। जिसे अष्टांग योग साधना और दैनिक यज्ञ, भजन, पुजन द्वारा हम सक्रिय कर सकते है और इस कोष को परब्रह्म उर्जा के साथ जोड कर सचिदानंद शक्ती को भरपूर मात्रा मे प्राप्त कर परम् आनंद की सतत अनुभूती कर सकते है।
सत, रज, तम गुण के अनुसार शरीर उर्जा का वितरण प्रमाण -
00 - 10 वर्ष की आयु - सात्विक राजस तमस
वंश निर्मिती - ००. …. ०० ०० ००
विचार - ३० ………. ३० २० १०
पाचन - ३० ………. २० ३० ३५
शरीर वृध्दी - ४० ….. ३० ४० ५०
शरीर उर्जा संचय - ०० .. २० ०५ ०५
10 - 60 वर्ष की आयु - सात्विक राजस तमस
वंश निर्मिती - ३० ….. २० ३० ४०
विचार - २० ……. …. ४० २० १०
पाचन - २० …………. २० २५ ३०
शरीर वृध्दी - २० ……. १० २० २०
शरीर उर्जा संचय - १० .. १० ०५ ००
60 से 100 वर्ष की आयु - सात्विक राजस तमस
वंश निर्मिती - ०० ………. १० २० ३०
विचार - ३०……………. ४० २० १०
पाचन - १० ……………. २० २० २०
शरीर वृध्दी - १० ………. १० १० १०
शरीर उर्जा संचय - १० ….. १० ०५ ०५