वैदिक धर्म विज्ञान प्रश्नोत्तरी - भाग 4 :
वैदिक आरोग्य संकल्पना
हिंदू धर्म की संपूर्ण अवधारणा किस उद्देश्य से की गई है ?
हिंदू धर्म की संपूर्ण अवधारणा यह मनुष्य के आरोग्यदायी और आनंददायी जीवन के उद्देश्य से की गई है । इस कारण हिंदू धर्म के सभी तत्व एवं नियम यह हमारे चिरंतर आरोग्यदायी और आनंददायी जीवन के मूलतत्त्व है। इसिलिए हमे जीवन मे हिंदू धर्म के तत्वों को समझ लेना चाहिए और उनका यथायोग्य पालन करना चाहिए।
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार मनुष्य का शरीर किन तत्वो से बना है ?
हिंदू धर्म के वेद, आयुर्वेद और उपनिषद आदी शास्त्रों के अनुसार मनुष्य का शरीर यह निम्न तत्वों से बना है…
१. दृश्य स्वरूप स्थूल तत्व - पंच महाभूत ( भूमी, जल, अग्नि, वायू और आकाश )
२. अदृश्य स्वरूप स्थूल तत्व - मन, बुध्दी, अहंकार
३. अदृश्य स्वरूप चैतन्य तत्व - आत्मा ( चैतन्य उर्जा तत्व )
उपरोक्त अनुसार हमारे शरीर के तीन मुख्य भाग होते है …
१. स्थूल शरीर या भौतिक शरीर, और
२. कारण शरीर या उर्जा शरीर
मन हमारे शरीर (भौतिक और सूक्ष्म) का महाद्वार है।
बुध्दी हमारे शरीर की रक्षाप्रणली (भौतिक और सूक्ष्म) है।
अहंम तत्व (अहंकार तत्व) शरीर के अस्तित्व का आधार है।
३. चैतन्य शरीर
आत्मा : यह हमारे शरीर मे प्रकृती संचालक वैश्विक चैतन्य प्रणाली का तत्व है।
हिंदू धर्म के अनुसार हमारा शरीर और ब्रह्मांड ( विश्व ) का क्या संबंध है ?
वेदों मे कहा गया है की, विश्व मे कार्यरत सभी सिध्दांतों का उपयोग मनुष्य के शरीर की निर्मिती मे किया गया है। इस कारण ही भारतीय तत्वज्ञान के अनुसार हमारे शरीर की आंतरीक क्रियाओं को समझकर और विभिन्न आंतरीक संप्रेरकों को जागृत कर हम ब्रह्मांड की शक्तीयों की कार्यपध्दती की अनुभूती प्राप्त कर सकते है और उन शक्तीयों से अपने आप को भर सकते है।
यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे
हिंदू धर्म के अनुसार आरोग्यदायी और निरंतर आनंदमयी जीवन जीने के लिए क्या करना चाहिए ?
हिंदू धर्म के अनुसार आरोग्यदायी और निरंतर आनंदमयी जीवन जीने के लिए वेदों मे बताए गए अनुसार अदृश्य सचिदानंद वैश्विक उर्जा पाने के उद्देश्य से निरंतर भौतिक संसाधनोका मर्यादीत उपभोग लेते हुए प्रयास करते रहना चाहिए।
हिंदू धर्म मे आरोग्यदायी और आनंदमयी जीवन के लिए निम्ना नुसार पाच यम और पाच नियमों के साथ अष्टांग योग जीवन पध्दती का पालन करने का मार्ग बताया गया है..
पाच यम - १. अहिंसा, २. सत्य, ३. अस्तेय, ४. ब्रह्मचर्य, ५. अपरिग्रह
पाच नियम - १. शौच, २. संतोष, ३. तप, ४. स्वाध्याय, ५. ईश्वर प्रणिधान
आसन
प्राणायम
प्रत्याहार
ध्यान
धारणा
समाधी
हिंदू धर्म मे सचिदानंद वैश्विक शक्ती को पाने के लिए भौतिक जग के उपभोग करने का त्याग करने को कहा गया है क्या ?
नही, हिंदू धर्म मे सचिदानंद वैश्विक शक्ती को पाने के लिए भौतिक जग के उपभोग करने का त्याग करने को नही कहा गया है। केवल भौतिक जगत का मर्यादीत उपभोग करने को कहा गया है और हमारे जीवन का उद्देश्य सचिदानंद वैश्विक उर्जा की ओर केंद्रीत करके जप, तप, व्यायाम, प्राणायम, ध्यान, धारणा और समाधी इन माध्यमों द्वारा साधना करने को कहा गया है।
हिंदू धर्म मे सचिदानंद वैश्विक शक्ती कभी नष्ट नही होती और वह शक्ती केवल परावर्तित होती रहती है यह तत्व किस वेद मंत्र मे बताई गई है ?
ओं पूर्ण मद: पूर्ण मिदं पूर्णात पूर्ण मिदश्चते ।
पूर्णस्य: पूर्ण मादाय: पूर्ण मेवावशिष्यते ।।
आयुर्वेद के अनुसार आरोग्य के लक्षण बताईए ……
आयुर्वेद के अनुसार आरोग्य के लक्षण -
सम दोष: समाग्निश्च सम धातु मल क्रिया: ।
प्रसन्नात्मेंद्रियमन: स्वस्थैत्यभियते ।।
।।शुश्रुत ।।
सम दोष: म्हणजे आपल्या शरीरातील वात, पित्त आणि कफ हे समान असावेत,
समाग्निश्च म्हणजे आपल्या शरीरातील जठराग्नि तसेच रस, रक्त, मास, मेद, अस्ती, मज्जा आणि शुक्र या सात धातुंचा पाचक अग्नि समान असला पाहिजे,
सम धातु म्हणजे आपल्या शरीरातील रस, रक्त, मास, मेद, अस्ती, मज्जा आणि शुक्र हे सात धातु सम प्रमाणात असले पाहिजे,
सम मल क्रिया म्हणजे आपल्या शरीरा मधून बाहेर पडणारे मल, मूत्र, घाम, केस, नख, डोळ्यातील कितड, कानातील मळ हे सर्व मल योग्य प्रमाणात बाहेर पडले पाहिजे
प्रसन्नात्मेंद्रियमन: म्हणजे आपला आत्मा, सर्व इंद्रीय आणि मन हे प्रसन्न असले पाहिजे
स्वस्थ शरीराची ही सर्व लक्षणे होत.
मनु द्वारा बताए गए धर्म के दस लक्षण क्योनसे है ?
धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियन्ग्रह: ।
धी र्विद्या सत्यम्क्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।
।। ६/९२ मनुस्मृती ।।
धृति - धैर्य
क्षमा - क्षमा
दम - सहनशीलता
अस्तेय - चोरी न करणे
शौच - शुध्दी
इंद्रीय निग्रह - इंद्रीय वरील योग्य नियंत्रण
धी - सात्विक बुध्दी
विद्या - सत्य- असत्य परखण्याची क्षमता
सत्य - शाश्वत नैसर्गिक तत्व
अक्रोध - क्रोध न करणे
हे दहा धर्माची लक्षणे मनु महाराज यांनी सांगितलेली आहेत. या सर्व नियमांचे पालन केल्यास आपले शारीरिक आरोग्य राखण्यात देखील मदत होते.
भारतीय हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर मे कितने उर्जा चक्र होते है ?
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर मे सात उर्जा चक्र होते है ।
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर के सात उर्जा चक्रों के नाम बताईए….
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर के सात उर्जा चक्रों के नाम निम्नानुसार है…..
मूलाधार चक्र
स्वाधिष्ठान चक्र
मणिपूर चक्र
अनहदनाद चक्र
विशुध्दी चक्र
आज्ञा चक्र
सहस्त्रार चक्र
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर के पाच उर्जा कोषों के नाम बताईए ।
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर के पाच उर्जा कोषों के नाम निम्नानुसार है…..
अन्नमय कोष
प्राणमय कोष
मनोमय कोष
विज्ञानमय कोष
आनंदमय कोष
हिंदू धर्म शास्त्रो के अनुसार आरोग्यदायी दिनचर्या कौनसी है और यही दिनचर्या आरोग्यदायी होने की क्या वजह है ?
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार आरोग्यदायी निम्नानुसार है, क्योकी, इस दिनचर्या मे बताए गए समयों मे हमारे शरीर के विशिष्ट अंगों मे चैतन्य उर्जा का प्रभाव अधिक होता है और इस कारण उस समय हमारे शरीर का वह अंग नैसर्गिकत: अधिक कार्यक्षमता से कार्य कर रहा होता है, इसे ही हमारे शरीर की चैतन्य उर्जा घडी भी कहते है ।
मनुष्य शरीर का चैतन्य उर्जा चक्र / घडी
03 - 05 - ( ब्रह्म मुहूर्त ) : फूफ्फुस द्वारा रक्तशुद्धी - सुबह उठ कर व्यायाम, प्राणायम, ध्यान-साधना, खुली हवा मे टहलना,ई. आरोग्य संवर्धन के सात्विक कार्य करना चाहिए
05 - 07 - ( सुबह ) : बडी आंत द्वारा मल बंधन एवं विसर्जन - सुबह उठ कर व्यायाम, प्राणायम, ध्यान-साधना, खुली हवा मे टहलना,ई. आरोग्य संवर्धन के सात्विक कार्य करना चाहिए
07 - 09 - : जठराग्नि का प्रदिपन - नाश्ता या भोजन करना चाहिए
09 - 11 - : स्प्लीहा ( Spleen ) भोजन को पचाने का कार्य करती है - इस समय हम कुछ महत्वपूर्ण निर्णयात्मक कार्य कर सकते है
11 - 13 - : हृदय भरपूर उर्जा से काम करता है - आप दोपहर का भोजन कर सकते है। सर्वोच्य उर्जा / कार्यक्षमता
13 - 15 - : छोटी आंत - अन्न पचन, थोडी सुस्ती और छोटी निंद ले सकते है।
15 - 17 - : मूत्राशय ( Bladder ), मूत्र निर्मिती एवं विसर्ग क्रिया प्रबल - पानी, शरबत या चाय- कॅाफी पिने की इच्छा होती है, सो इच्छानुसार पिना चाहिए, उर्जा संचय काल
17 - 19 - : वृक्क ( kidney ), अन्न द्रव्य से धातुओं के पृथक्करण की प्रक्रिया प्रबल, मन थोडा शांत होता है, हलकी आध्यात्मिक साधना का समय
19 - 21 - : Pericardium ? , हलके मनोरंजन का समय
21 - 23 - : Triple Burner - Endocrine & Metabolic digestion, निंद आने और सोने का समय
23 - 01 - : पित्ताशय ( Gallbladder ), सूक्ष्म पचनक्रिया, नविन कोशिकाओं की निर्मिती काल, इस समय गहरी निंद मे सोना चाहिए।
01 - 03 - : यकृत ( Liver ), रक्त की शुध्दी, सूक्ष्म पचनक्रिया, इस समय गहरी निंद मे सोना आवश्यक ।
हिंदू धर्म मे ज्योतिष्य शास्त्र और आयुर्वेद के अनुसार एक वर्ष मे कब और कितने ऋतु होते है जिसके अनुसार आयुर्वेद मे आरोग्य चिकित्सा की जाती है ?
हिंदू धर्म मे ज्योतिष्य शास्त्र और आयुर्वेद के अनुसार एक वर्ष मे १. वसंत, २. ग्रीष्म, ३. वर्षा, ४. शरद, ५. हेमन्त और ६. शिशिर, यह छे ऋतु होते है, जो प्रत्येक वर्ष मे निचे दिए नुसार आते है। इन ऋतुओं की नैसर्गिक प्रकृती को विचार मे लेकर आयुर्वेद शास्त्र मे मनुष्य के लिए आहार और विहार बताया गया है और इन ऋतुओं को विचार मे लेकर ही वैद्य बीमारिओं को ठीक करने के लिए औषधी का नियोजन करते है ।
अग्रेज माह हिन्दू माह ऋतु सूर्य राशी.
22 मार्च - 21अप्रेल - चैत्र वसन्त मेष ( Arise )
22 अप्रेल - 21 मई. - वैशाख वसन्त वृषभ ( Taurus )
22 मई. - 21 जून. - जेष्ठ ग्रीष्म मिथुन ( Gemini )
22 जून. - 22 जुलै. - आषाढ ग्रीष्म कर्क ( Cancer )
23 जुलै. - 21 ॲागष्ट - श्रावण वर्षा सिंह ( Leo )
22 ॲागस्ट - 23 सप्टेंबर - भाद्रपद वर्षा कन्या ( Virgo )
24 सप्टेंबर - 24 ॲाक्टोंबर - अश्विन शरद तुला ( Libra )
24 ॲाक्टोंबर - 23 नोव्हेंबर - कार्तिक शरद वृश्चिक (Scorpio)
24 नोव्हेंबर - 22 डिसेंबर - मार्गशीर्ष हेमन्त धनु (Sagittarius)
23 डिसेंबर - 22 जानेवारी - पौष हेमन्त मकर (Capricorn)
23 जानेवारी - 22फेब्रुवारी - माघ शिशिर कुंभ (Aquarius)
23 फेब्रुवारी - 22 मार्च - फाल्गुन शिशिर मीन ( Pisces )
ज्योतिष्यार्वेद …..
चैत्र (२३ मार्च ते २२ एप्रिल) वसंत - उन्हाळा
वैशाख ( २३ एप्रिल ते २१ मे ) वसंत - उन्हाळा
शमन -
संचय -
प्रकोप - कफ प्रकोप
जेष्ठ + ( २२ मे ते २१ जून ) ग्रिष्म - उन्हाळा
आषाढ ( २२ जून ते २२ जुलै ) ग्रिष्म - पावसाळा
शमन - कफ शमन
संचय - वात संचय
प्रकोप -
श्रावण ( २३ जुलै ते २२ ॲागस्ट ) वर्षा - पावसाळा
भाद्रपद ( २३ ॲागस्ट ते २३ सप्टेंबर ) वर्षा - पावसाळा
शमन -
संचय - पित्त संचय
प्रकोप - वात प्रकोप
अश्विन ( २४ सप्टेंबर ते २३ ॲाक्टोंबर ) शरद - पावसाळा
कार्तिक ( २४ ॲाक्टोंबर ते २३ नोव्हेंबर ) शरद - हिवाळा
शमन - वात शमन
प्रकोप - पित्त प्रकोप
संचय -
मार्गशीर्ष ( २४ नोव्हेंबर ते २२ डिसेंबर ) हेमंत - हिवाळा
पौष ( २३ डिसेंबर ते २२ जानेवारी ) हेमंत - हिवाळा
शमन - पित्त शमन
प्रकोप -
संचय -
माघ ( २३ जानेवारी ते २२ फेब्रुवारी ) शिशिर - हिवाळा
फाल्गुन ( २३ फेब्रुवारी ते २२ मार्च ) शिशिर - उन्हाळा
शमन -
प्रकोप -
संचय - कफ संचय
आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार मनुष्य मे कौनसी तीन प्रकृती पाई जाती है ?
आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार मनुष्य मे निम्न तीन प्रकृती पाई जाती है ..
वात - वायू + अग्नि तत्व
पित्त - अग्नि +जल तत्व
कफ - जल + भूमी तत्व
हिंदू धर्म के अनुसार आयुर्वेदीक चिकित्सा पध्दती मे मनुष्य की प्रकृती या रोग का किस आधार पर निर्धारिण किया जाता है ?
आयुर्वेदीक चिकित्सा पध्दती मे मनुष्य की प्रकृती या रोगों का निर्धारण शरीरिक बदलाव ( लक्षण ) और शरीर मे वात, पित्त और कफ प्रकृती के असंतुलन के आधार पर किया जाता है ।
निचे वात-पित्त-कफ प्रकृती का आदर्श गुण तक्ता दिया है जिसके आधार पर कोई भी व्यक्ती आसानी से अपनी शारिरीक प्रकृती का निर्धारण कर सकते है ….
स्वयं वात-पित्त-कफ प्रकृती निर्धारण तक्ता :
आदर्श गुण तक्ता - Vata Pitta Kaph
कफ प्रकृती गुण -
शारीरिक आकारमान - 04 08. 12
निंद - 04 08. 12
बाल - 04 08. 12
शारिरीक बल - 04 08 12
पित्त प्रकृती गुण -
बुध्दी - 08 12 04
निर्णय क्षमता - 08 12 04
शरीर का तापमान - 08 12 04
वात प्रकृती गुण -
क्रोध - 12 08 04
चंचलता - 12 08 04
बोलने की गती - 12 08 04
वर्णनात्मक गुण :-
त्वचा का रंग - गेहूवा पित सावला
त्वचा की मोटाई - मध्यम पतली जाडी
दांत - मध्यम अंदर बडे
बालो का रंग. - सावला. सोनेरी. काला
बालो की मोटाई. - मध्यम बारीक मोटे
बालो की घनता. - मध्यम मध्यम भरपूर
हड्डीया. - मध्यम मध्यम. मोटी
नाक. - तिखी मध्यम मोटी
कान. - मध्यम. छोटे. बडे
रक्त की लाली. - मध्यम. बहुत अच्छी कम
आवाज - कठोर. तिखी. मिठी